राजस्थान में किसान आंदोलन व इसका महत्व जाने।?

अंग्रेजी शासन से पूर्वी राजस्थान के राज्यों में शासक सामंत और किसानों के परस्पर संबंध सहयोग सद्भाव पर निर्भर थे भूमिका संभावित में प्रमुखता दो प्रकार का था एक में भूमि जो शासक के सीधे नियंत्रण में होती थी उसे खालसा भूमि  का जाता था  दूसरी वे भूमि जो संबंधों के नियंत्रण में थी उसे जागीर भूमि कहा जाता था किसानों का भूमि कर तांत्रिक भी कर लागबाग देना होता था अंग्रेजी शासन के पश्चात किसानों का शोषण बढ़ गया इसलिए किसानों ने कई किसान आंदोलन किए ।

        * बिजोलिया किसान आंदोलन व विजय सिंह पथिक                              (1913-1922) -
सन 1913 में पहले साधु सीतारामदास और बाद में विजय सिंह पथिक के नेतृत्व में बिजली आंदोलन प्रारंभ हुआ  सन 1915 बिजोलिया किसान आंदोलन को एक नया  उत्साही सासी नेतृत्व करता विजय सिंह पथिक मिला 1988 में बिजोलिया के किसानों ने मंदा लाल के अध्यक्षता में एक किसान पंच बोर्ड की स्थापना की।
किसानों के ऋण देने से मना कर दिया इस आंदोलन को कुचलने के लिए विजय सिंह पथिक  की गिरफ्तारी जरूरी थी परंतु विजय सिंह पथिक कोटा चले गए किसानों के सत्याग्रह में साधु सीतारामदास रामनारायण चौधरी प्रेमचंद भील और माणिक्य लाल वर्मा भी गिरफ्तार हुए ए जी जी के हस्तक्षेप के परिणाम स्वरुप दिखाने के जागीरदारों और बिजलिया किसानों के मध्य समझौता संपन्न हुआ ।

                     * बेंगू आंदोलन-
 विजय सिंह पथिक माणिक्य लाल वर्मा और रामनारायण चौधरी  मैं इस आंदोलन का मार्गदर्शन किया सन 1921 ईस्वी में यहां का कठोरता से दमन किया गया डेंगू सामान ठाकुर अनूप सिंह रावत ने किसानों से समझौता किया
परंतु अगर अंग्रेजों ने इसे नहीं माना रायला और गोविंदपुरा गांव चांदन झाली रात दोनों किसान रूपा और कृपा से दोगे 500 से ज्यादा किसानों को बंदी बना लिया गया  अतः 53 में से 34 लागत समाप्त कर बेगार पर रोक लगाने की घोषणा  कर किसानों से समझौता करना पड़ा।

                 * मारवाड़ में कृषक आंदोलन -
मारवाड़ हितकारिणी सभा के माध्यम से  कर सकूं की समस्याओं के प्रति सक्रिय जनमत तैयार हुआ सन 1936 ईस्वी में राज्य सरकार ने 119 लागतु की समाप्ति की घोषणा की सन 1939 ईस्वी में मारवाड़ लोक परिषद ने किसानों की मांगों का समर्थन किया 19419 समिति की नियुक्ति कर  बेगम पर अपनी रिपोर्ट तैयार की मारवाड किसान सभा नामक समिति की स्थापना जून 1941 में अंग्रेजों ने गठित की थी जो किसानों के विरुद्ध थी ।
1941-1942 इसलिए मैं जाट परिषद कृषक सुधारक सभा ने भी कई माफ करने के लिए कई प्रयास किए दिसंबर 1943 ईसवी में दरबार ने जागीरो में भूमि बंदोबस्त के आदेश दिए डाबरा कांड 13 मार्च 1947 को पुलिस ने परिषद कार्यकर्ता हूं वह किसानों के शांतिपूर्ण जुलूस पर हमला कर दिया मारवाड़ में किसानों का नेतृत्व श्री जयनारायण व्यास राधा कृष्ण दास आदि जैसे जुझारू नेताओं ने किया।

                ÷बूंदी किसान आंदोलन÷
  पंडित नयनू राम रामनारायण चौधरी और हरि भाई किंग कर के नेतृत्व में बूंदी के किसानों ने भी अन्याय वे लागबाग के विरुद्ध आंदोलन किया
बड़गांव में किसानों की सभा पर पुलिस ने गोलियां चलाई 4 जून 1922 ईस्वी में डाबी में पंचायत करने पर आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया।

        * अलवर का किसान आंदोलन (नीमुचणा कांड)-
जगँली सूअरो  के उत्पाद से दुखी होकर राज्य के किसानों ने आंदोलन चलाया किसानों ने लगान वृद्धि के विरोध में नींबू चना गांव में सभा का आयोजन किया
जिन्होंने गांव छोड़कर जाने वाले लोगों पर गोलियां चलाई जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए इसके अलावा मारवाड़ शेखावटी जयपुर एवं रोती के किसानों ने भी विद्रोह किया।

             * सीकर व शेखावटी में किसान आंदोलन-
 सीकर मैं किसान आंदोलन का आरंभ राव राजा कल्याण सिंह द्वारा 25 से 50% तक भु राजसव वर्दी करने से हुआ वह 1930 ईस्वी में वर्षा कम होने पर भी नहीं दर से लगान वसूली की रामनारायण चौधरी के नेतृत्व में किसानों ने आवाज उठाई 1931 ईस्वी में राजस्थान जाट क्षेत्रीय सभा की स्थापना हुई बसंत पंचमी 30 जनवरी 1939 को सीकर में यज्ञ आचार्य व हेमराज शर्मा की देखरेख में जाट प्रजापति महायज्ञ आरंभ हुआ 25 अप्रैल 1934 को कटराथल में श्रीमती किशोरी देवी की अध्यक्षता में एक विशाल महिला सम्मेलन का आयोजन किया गया
इसमें लगभग 10000 महिलाओं ने भाग लिया जिनमें श्रीमती दुर्गा देवी शर्मा श्रीमती श्रीमती रमा देवी उमा देवी आदि प्रमुख दादी द्वारा उत्साहित करने पर किसानों ने लगा देने से मना कर दिया पुलिस द्वारा गोलियां चलाने पर 4 किसान चेतराम टिकु राम राम आसाराम शहीद हो गए तथा 175 किसानों को गिरफ्तार कर लिया गया 1935 के अंत तक किसानों की लगभग मांगे पूरी कर दी इसके प्रमुख नेता सरदार हरलाल सिंह नेतराम सिंह  गौरीर  पृथ्वी सिंह कोटडा पन्ने सिंह बाटडानाउ  हरू सिंह पलथाना  गौरव सिंह कटराथल ईश्वर सिंह भैरूपुरा लेख राम कस्वाली आदि थे।

          * किसान आंदोलन का महत्व-
 राज्य वे राष्ट्रीय स्तर पर इन आंदोलनों का महत्व था किसान आंदोलनों ने शासकों और अंग्रेजी सरकार की दमनकारी नीति को देश के सामने रखा राजनैतिक जन चेतना के विकास में योगदान दिया
सामंती व्यवस्था को समाप्त करने में प्रजातांत्रिक शासन की भावना को बल मिला किसानों में जनता के पक्ष में राष्ट्रीय नेताओं और कांग्रेस ने भी समर्थन दिया।

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